शुरुआत एक नवीन पहल की (अंतिम भाग-5)

शुरुआत एक नवीन पहल की (अंतिम भाग-5)

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क्रमश: ……*****………. भाग-4 से

जब अनुपमा के पतिदेव अचानक ही देश की खातिर शहीद हुए तो देवर राजीव कॉलेज के अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी करते-करते संबंधित जगहों पर नौकरी के लिए आवेदन भी भर रहा था! साथ ही भाभी को पूर्ण रूप से सहयोग भी कर रहा था, पर इन्‍हीं सब ऊहापोह में न जाने कब उसे अपनी भाभी से ही प्‍यार हो गया। राजीव दिनबदिन सोचने लगा कि उसकी कहीं तो नई नौकरी लगे तो अनुपमा से विवाह कर उसे यहॉं के प्रताड़ित चंगुल से बचाकर अपने साथ ले जाएगा! ताकि अनुपमा को सहयोग भी हो जाएगा और कंवल की परवरिश भी यथावत हो जाएगी। वह कई बार माता-पिता को समझाने की कोशिश भी करता! कि भैय्या के साथ जो भी हुआ, उसके लिए सिर्फ भाभी को कारणीभूत ठहराया जाना उचित नहीं है! बल्कि उन्‍हें इस स्थिति से उबरने के लिए हम सबको सहयोग करना होगा और भाभी को वर्तमान जिंदगी जीने के लिए एक नवीन पहल की शुरुआत तो हम सबको घर से ही करना होगी न मॉं?

इन्‍हीं सब कशमकश में जिंदगी की नाव धीमी गति से ही सही, पर बह तो रही थी! न जाने उस दिन अनुपमा की सास को अचानक क्‍या हुआ? उसके पूर्व वे बड़े ताऊजी और ताईजी से कुछ चर्चा कर रहीं थीं और अनुपमा को ताने मारकर बोलने लगी कि एक बेटे को खा गई! वह काफी नहीं था, जो राजीव के पीछे पड़ गई हो। मालूम भी है तुम्‍हें, समाज और बिरादरी वाले तुम दोनों के बारे में क्‍या-क्‍या बातें करते हैं? ऐसे बरस पड़ीं मानों भूचाल आ गया हो! और तो और राजीव के मन में क्‍या चल रहा है, यह जाने बिना ही बोलने लगी कि तू क्‍या अनुपमा के सहयोग के पीछे पड़ा रहता है हमेशा ही! कंवल को छोड़े वो झुलाघर और नौकरी जाए आटोरिक्‍शा या कोई दूसरे वाहन से चली जाएगी या नहीं तो नहीं जाएगी। घर ही की गाड़ी से छोड़ना इतना जरूरी है क्‍या? महारानी हैं घर की, जो रोज बग्‍गी चाहिए! आखिर जात बिरादरी वाले क्‍या कहेंगे? तुझे अपनी जिंदगी जीनी नहीं है क्‍या? और ब्‍याह नहीं रचाएगा क्‍या? कब तक यूँ ही कँवारा ही बैठा रहेगा तू? और ससुर जी हैं कि सब सुनते रहे जबकि वे अनुपमा की हालत से वाकिफ थे। इतनी सब उलाहनाएं सुनने के बाद तांव-तांव में अनुपमा कंवल को लेकर मायके चली गई और राजीव हक्‍का-बक्‍का होकर अवाक खड़ा रह गया।

कई बार कारण सामने दिखते हुए भी निरपराधी को हमेशा ही दोषी ठहराया जाना कहाँ तक सही है? यही तो हमारे समाज की विडंबना है! वैसे तो सच का साथ देने की कोशिश करने वाले कुछ विरले ही होते हैं और जो सच का साथ देते भी हैं तो उनके ऊपर भी अनावश्यक रूप से इल्जामात की लड़ी सी लग जाती है, जिससे निकलने वाला धुआं पटाखों के धुएं से भी खतरनाक होता हैं।

इसके बाद भी राजी और वत्‍सला की सलाह पर अनुपमा ने मायके से नौकरी पर जाना जारी रखा ताकि उसकी मानसिक स्थिति मजबूत रहे और वह कंवल की देखरेख कर सके। उसे तो पता भी नहीं था कि देवर राजीव उसके बारे में क्‍या सोचता है?

अकस्‍मात ही एक दिन राजीव को मुंबई में उसके मन मुताबिक नौकरी के लिए नियुक्ति-पत्र आखिर मिल ही जाता है और वह अपने मन की बात अनुपमा से कह देता है कि मैं तुमसे प्‍यार करने लगा हूँ! शादी करना चाहता हूँ तुमसे, कंवल की परवरिश हम दोनों मिलकर अच्‍छे से करेंगे, ताकि भैय्या और आपने साथ देखा हुआ सपना पूरा हो सके। मैं तुम्‍हें और ऐसी परेशानी में छोड़कर नहीं जा सकता! अब अंतिम निर्णय तुम्‍हें लेना है। इतना सुनते ही अनुपमा बोली कि इससे अच्‍छी बात और हो क्‍या सकती है? अपने घर की समस्‍या सुलझाने की कोशिश कर रहे हो! जानते हो, समझते हो, वैसे भी मेरे ऑफीस की सखियॉं मुझे कंवल की परवरिश और आगे की जिंदगी जीने के लिए दूसरी शादी करने की सलाह दे भी रहीं थीं! आखिर इन सामाजिक बेड़ियों की जंजिरों को तोड़ने के लिए हम में से ही किसी को “एक नवीन पहल आरंभ करना तो होगी न?” पर राजीव तुम अपनी जिंदगी क्‍यों मेरे लिए दॉव पर लगा रहे हो?

सुनते ही राजीव ने कहा…. नहीं अनुपमा जी, मैं सच में दिल से मोहब्‍बत करने लगा हूँ तुमसे…. अब रजामंदी तुम्‍हारी है! अब बोलो इस नवीन पहल की मुहिम में कदम से कदम मिलाकर साथ दोगी न मेरा? अनुपमा ने कहा मैं जरूर साथ दूँगी जिंदगी भर तुम्‍हारा, जैसे कि पहले भी देती ही आई हूँ पर इस समाज और बिरादरी वालों का क्‍या करें? वे तो मुझे ही भला-बुरा कहेंगे न?

ये कौन से खोखले समाज की बात कर रही हो अनुपमा? सबसे पहली बात ये कि क्या तुम इस रिश्‍ते के लिए तैयार हो? सबसे महत्वपूर्ण तुम्‍हारी राय है क्योंकि तुमने पहला जीवनसाथी खोया है और तुम्‍हारी मानसिक स्थिति भी तुम स्वयं ही जानती हो। इसलिए सबसे पहले तुम्‍हारा मत समझना बहुत जरूरी है। फिर आती है बारी मेरी सलाह की, तो मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ, भले ही तुम उम्र मे बड़ी भी हो तो भी क्‍या फर्क पड़ता है और मैं तो तुम्हें समान नजर से ही देखता हूँ।

चूंकि, हिन्दू समाज मे विवाह के समय लड़का और लड़की का गोत्र देखा जाता है पर मैं और तुम इन सब चीजों में विश्‍वास नहीं करते और एक दूसरे से विवाह के लिए सहमत हैं।

यह सब विचार-विमर्श बहुत देर से अनुपमा के सास-ससुर और मॉं, भाई, सखियाँ राजी, वत्सला और दोस्‍त रमेश सुनते रहते हैं और शहीद अशोक का जिगरी दोस्‍त जो नवीन दौर में विश्‍वास करता है, साथ ही नवीन प्रकाश की उम्‍मीदों की किरणों से सब बुजुर्गों की ऑंखे खोलता है ताकि उनकी स्‍वीकृति से ही राजीव और अनुपमा की शादी की एक नवीन पहल की शुरुआत कामियाबी ओर रूखसत हो सके।

दोस्‍त रमेश राजीव के हाथों में अनुपमा का हाथ देते हुए! कंवल को दोनों की गोद में देता है और वे सभी बुजुर्गों का आशीर्वाद पाते हैं, “शुरुआत एक नवीन पहल की करने के लिए।”…. और इतने में अनुपमा की स्थायी नौकरी हेतु नियुक्ति पत्र भी आ जाता है।

जी हां साथियों…. तो ये था अंतिम भाग-5! यह प्रथम प्रयास कहाँ तक सार्थक रहा, यह तो आपकी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करेगा और यह कहानी मेरी आंखों देखी है, जिसको मैने शब्दरूपी मोतियों से पिरोने की कोशिश की है।

अतः आपसे अनुरोध है कि अवश्य ही पढ़िएगा और अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करिएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं के इंतजार रहेगा। 

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