शुरुआत एक नवीन पहल की (भाग-1)

शुरुआत एक नवीन पहल की (भाग-1)

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आज अनुपमा फिर ऑफिस में देर से आई! एक तो जैसे-तैसे दैनिक आधार पर ही वेतन मिलने वाला था, पर वही तो उसके लिए जीवन जीने के लिए डूबते को तिनके का सहारा था। पति के असामयिक निधन के गहन दुख के पश्‍चात बहुत ही मुश्किल से संभली थी न वो।

ऑफिस में आज उसका मूड कुछ उखड़ा-उखड़ा सा ही था! न जाने उसे मन ही मन कौन सी बात खाए जा रही थी।आखिर वत्‍सला ने पूछ ही लिया! क्‍या हुआ अनुपमा दीदी? आपकी तबियत तो ठीक है न?

हॉं रे वत्‍सला! मेरी तबियत को क्‍या हुआ? मैं तो बस इन सामाजिक बंधन के तले…. कहते कहते रूक गई! फिर रूऑंसे मन से…. ऐसा लग रहा है, मानों धंसी जा रही हॅूं सिर्फ रिश्‍ते निभाते-निभाते।

इन सामाजिक रिश्‍तों की बागडोर तोड़ी भी नहीं जा सकती न? एक तो पतिदेव फौज में थे! सो वे विवाह के कुछ दिन पश्‍चात ही देश को अपनी सेवाएं देने में जुट गए और नियमित रूप से देते रहें और मुझे मजबूरन परिवार के साथ ही रहना पड़ा! यह कहकर वह कुछ शब्‍दों को कहते-कहते सहमकर रूक सी गई।

वत्‍सला बोली! अरे दीदी कहो न, कहते-कहते क्‍यों रूक गई? अपने दिल की बात मुझसे नहीं तो किससे कहोगी दीदी? इतने में अनुपमा को फोन आया, मैं आया हूँ लेने! खड़ा हूँ बाहर। बस फिर अनुपमा चल दी और वैसे भी ऑफीस छूटने का समय भी तो हो चुका था। वत्‍सला देखती ही रह गई कि दीदी किसके साथ जा रही हैं।

और अनुपमा के जाते ही प्रकाश सबके बीच में जोर से बोल पड़ा! विधवा होते हुए भी किसी के भी पिछे बैठकर चली गई। सुनते ही वत्‍सला ने जवाब दिया, क्‍यों जी हमारे समाज में किसी भी विधवा का किसी के भी पिछे बैठकर जाना मना है क्‍या? और यही स्थिति यदि किसी पुरूष की हो और वह दूसरी शादी भी रचाए, और उसकी सौ गल्तियां भी माफ है, है न जी? यही कहती है न आपकी डिक्‍शनरी? प्रकाश चुप्‍पी साधे हुए घर की ओर चल दिया।

……. ।।।।। क्रमशः भाग-2 की ओर ।।।।। ……..

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