मेरे मां बनने का सफर!

मेरे मां बनने का सफर!

मातृत्व एक ऐसा सफर है जो बहुत ही ऊंची नीची डगर से होकर गुजरता है | मेरा भी सफर कुछ ऐसा ही था जब मुझे पता चला कि मैं  मां बनने वाली हूं शरीर के साथ साथ रोजमर्रा की में भी बहुत सारे बदलाव हुए | कभी खट्टा तो कभी नमकीन खाने का तो कभी कुछ भी ना खाने का मन करता | कई कई बार रात भर नींद ना आती तो कई बार बेपरवाह सोए रहने महसूस होता कई बार जी मचलता तो कई बार रोने का मन करतापर सब कुछ एक पल में भूल गई जब मेरी बेटी पहली बार मेरे हाथों में आई पहली बार जब अपने गुलाबी पंखुड़ी जैसे होठों से मेरे तरफ मुस्कुराई |

हमेशा मुझे डर लगता कैसे उसे मैं उठाऊं | कैसे खाना खिलाओ बड़ों का साथ तो था पर कहते हैं ना मदर नेचर सब कुछ अपने आप सिखा देती है | गलतियां करती थी जैसे एक बार खाना खिलाने के पहले खाने में नमक नहीं था | बेटी ने खाना नहीं खाया समझ में नहीं आया | फिर खाना चखा और अपनी गलती समझी आज तक चाहे मुझे कितना भी काम हो हमेशा खाना चख ही उसे खिलाती एक परिचित ने सलाह दिया डायपर मत पहनाओ | जिस कारण मेरी बेटी रात में गीला कर देती | पता ही नहीं चलता था कई बार मेरी नींद लग जाती और बच्ची गीले में ही सोई रहती | फिर डॉक्टर ने सलाह दी | दिन भर नहीं पर रात को डायपर जरूर पहनईए ताकि बेबी के साथ मां की भी नींद पूरी हो ताकि दिनभर मां को स्फूर्ति रहे |

मेरे मां बनने का सफर!

एक बात मैंने हमेशा गठान बांध ली कि मैं अपनी बेटी की परवरिश सिंपल रखूंगी ताकि आगे चलकर मुझे और उसे भी कोई परेशानी ना हो | समय पर लगाकर उड़ने लगे संयम के साथ उसे हर चीज सिखाई तो कुछ चीजें मैंने भी सीखी | पहले अपने हाथों से खाना खिलाती फिर धीरेधीरे परिवार के साथ बिठाकर खिलाया | मेरी मां ने सिखाया छोटी मोटी घरेलू नुस्खे भी अपना कर देखो जैसे सर्दी की शुरुआत होते ही गर्म पानी दिया | हाथ पैरों में सरसों तेल से मालिश की | ज्यादा पेट दर्द होने से हींग का लेप लगाया छोटी मोटी बीमारियां ठीक होती पर जहां जरूरत हो वहां डॉक्टर को भी दिखाया |

कहते ना इंसान गलतियों से ही सीखता है कुछ गलतियां मैंने भी की | जैसे पहले कभी घर में दवाई ना रखती पर अब सर्दी खांसी बुखार के लिए दवाइयां रखने लगी रात बे रात जरूरत पड़े तो घर में दवाई रहे डॉक्टर का नंबर अपने इमरजेंसी कांटेक्ट में सेव करके रखा मेरी बेटी भी बहुत चंचल है | एक जगह कभी नहीं टिकती हमेशा भगवान से प्रार्थना करती थी कि कब उसका स्कूल शुरू हो | ताकि मैं शांति से कुछ पल अपने लिए बिता पाऊं | पर पहला दिन जब स्कूल गई हालांकि 2 घंटे का ही स्कूल था और मैं घड़ी के बारबार देख रही थी |

अति संरक्षित परवरिश नहीं कि | हमेशा बच्चे के साथ बच्चे बन जाती और जहां मां बनकर डांटना हो, समझाना हो | मैं वह भी करती हूं | जहां जरूरत पड़ती है वहां पति और परिवार के सदस्य से मदद मांगने से ही पीछे नहीं  हटती हूं और उनकी सलाह भी मानती हमेशा उदाहरण देकर उसे समझाया | ताकि जल्दी और देर तक उसे समझ रहे अंत में मैं एक ही बात मैंने सीखा और आगे भी सिखाती रहूंगी की समय के साथ धीरे धीरे आप सीखते हैं | जहां जरूरत हो वहां डांट फटकार ये भी जरूर पर  संयमप्यार दुलार से ही मां बनने के सफर में चार चांद लग जाते हैं |

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