मेरी नन्ही सी जान के आने की आहट और उसके आने के बाद तक का सुहाना सफर

मेरी नन्ही सी जान के आने की आहट और उसके आने के बाद तक का सुहाना सफर

मेरी नन्ही सी जान के आने की आहट जिस दिन हुई मेरी ज़िन्दगी का यक़ीनन सबसे खूबसूरत दिन था वो, जब हमारे सपनों को एक जीवन मिलने कि खुशखबरी मिली थी। और फिर बस पल-पल इंतज़ार में कटने लगा कि कब तुम आओ मेरी गोद में, तुम्हे छूकर महसूस कर सकूं और ये सपना एक शक्ल, एक आकार ले ले। और फिर कभी मुश्किल तो कभी हँसते हुए वो दिन बीतने लगे। तुम्हे अपने भीतर महसूस करना, मेरे लिए ख़ुशी के साथ अनूठा अनुभव भी था कि मैं एक जीवन को दुनिया में ला सकती हूँ ।शायद माँ बनने वाली हर स्त्री इस अनुभव से गुजरती होगी और इन्ही भावनाओं को महसूस भी करती होगी।

तुम्हारे इंतज़ार की घड़ियाँ भी यूँ धीरे-धीरे गुजर रही थीं मानो हमारे सब्र का इम्तिहान ले रही हों पर फिर भी इस इंतज़ार का भी अपना ही मज़ा था। और फिर वो सुनहरा दिन भी आया जब तुम हमारी छोटी सी दुनिया को गुलज़ार करने आईं….हमारी नन्ही सी परी…वो सारे पल आज भी यादों की पोटली में से बाहर निकल आते हैं यूँ जैसे कि कल की ही तो बात हो। तुम आईं और जब पहली बार तुमको मैंने अपने हाथों में लिया, तुमको छुआ, तुम्हारा वो पहला मख़मली,मुलायम स्पर्श, वो मासूमियत से तुम्हारा बड़ी-बड़ी आँखों से टुकुर-टुकुर इधर-उधर ताकना जैसे कि तुमने भी हमारी तरह ही बहुत इंतज़ार किया था हमारी ही तरह इस दुनिया में आने का, हमसे मिलने का और अब सब कुछ जल्दी-जल्दी देख लेना चाहती हो। आज भी सब कुछ तरोताज़ा है जहन में पर सच में बेहद मुश्किल है उन भावनाओं को यूँ शब्दों में पिरोना। सपना जब शक्ल लेकर आपके सामने आ जाये,साकार हो जाये वो ख़ुशी दी तुमने मुझे।तुम मेरी बाँहों में थीं और ये यकीन करना मुश्किल था कि तुमको मैंने रचा है।जाने कब मेरी ऑंखें ख़ुशी से भर आईं।

मेरी नन्ही सी जान के आने की आहट और उसके आने के बाद तक का सुहाना सफर

और फिर शुरू हुई एक नयी खुशियों भरी कहानी जिसमें तुम्हारे रोने पर मुझे भी रोना आ जाता और तुम्हारे हँसने पर मैं भी खिलखिला पड़ती थी| तुम पर ही मेरी ज़िन्दगी केंद्रित हो गई थी। और माँ बन जाने के एहसास ने और कई एहसासों से तो नवाज़ा ही मुझे पर एक ज़िम्मेदारी भी आ गई मुझमे कि प्रकृति ने माँ की एक ऐसी भूमिका सौंपी थी मुझे, जिसमें ज़िम्मेदारियाँ भरपूर थीं और जिसमें कोई भी माँ खुद को हारते या फेल होते हुए नहीं देख सकती। और यही सब मेरे साथ भी शुरू हुआ खुशियों के साथ ज़िम्मेदारियाँ भी पूरी करनी थीं मुझे। एक फ्रॉक भी लेना हो तो सोचती कही से मेरी नन्ही सी जान को चुभेगी तो नहीं। तुम्हारे आने के पहले तो बाजार में बच्चों की हर मिलने वाली चीज़ सुन्दर ही लगती थी।सोचती थी तुम्हारे लिए क्या न ले लूँ। पर तुम्हारे आते ही सारा नजरिया ही बदल गया मेरा। मेरी बच्ची को किसी चीज़ से खरोंच भी न लगे, ये चीज़ ले रही हूँ तो सबसे सौम्य-मुलायम और नुकसानदायक तो बिलकुल न हो।

चीज़ों के लेबल तक पढ़ने लगी कि बच्चों के लिए ये चीज़ सुरक्षित है या नहीं? तुम्हारे खिलौने, कपड़े, खाना-पीना सब कुछ बहुत ही सावधानी से करती। तुम्हारी एक छींक भी जैसे ज़िन्दगी में तूफ़ान ला देती कि क्या गलती हुई जो मेरी बच्ची को ऐसे हो गया।पर माँ तो ऐसी ही होती है न ।तुम्हारे साथ न जाने कब दिन महीनों में बदलने लगे थे मैं भी तुम्हारे साथ ही माँ के रूप में बढ़ रही थी। तुम्हारा पलटना शुरू हुआ और मेरा डर बढ़ा बेड पर ही नहीं बेड के चारों तरफ के फ्लोर पर भी तकिये और कुशन की संख्या बढ़ने लगी फिर भी तुम कभी-कभी गिर ही जातीं और तुम्हारे रोने पर मेरा भी रोना छूट जाता।

और तुम जब घुटनो पर चली तो तुम्हारी पहुँच का दायरा भी बढ़ा जो भी कुछ सामने आता तुम्हारे, मुँह में तुम उसे उठाकर डालती थीं फिर तो ड्रेसिंग टेबल हो या फिर और कोई जगहें सब सामान से ख़ाली होने लगीं कि तुम सुरक्षित रहो कहीं कुछ खुद को ही किसी चीज़ से नुकसान न पहुंचा दो। और तुम्हारे साथ ही अपना ध्यान भी मैं पहले से ज्यादा रखने लगी कि मुझे मजबूत होना ही चाहिए तुम्हारी देखभाल जो करनी थी और उसमे कोई कमी तो नहीं कर सकती थी सो मैं भी खुद को भी स्वस्थ और फिट रखने के जतन पहले से ज्यादा करने लगी थी।

कभी इंटरनेट पर खोजती, कभी तुम्हारी दादी-नानी से नुस्खे पूछती फिरती थी जिससे तुमको कोई इन्फेक्शन न हो,तुम बीमार न पड़ो।ये कोशिशें कामयाब भी हुई काफी हद तक तुमसे प्यार जो था और ये सब तो करना ही था आखिर अपनी जान से कौन नहीं प्यार करता।

शायद हर माँ बच्चे के आने पर ऐसी ही बन जाती होगी सुपरमॉम टाइप्स और बच्चे के लिए क्या सही क्या गलत इसी उधेड़बुन में रात दिन रहती है। और हाँ ये भी सोचती है कि जब बेबी बड़ा होगा तो थोड़ा आराम मिलेगा,ज़िम्मेदारियाँ कम होंगी। पर कहाँ जी? ज़िम्मेदारियाँ तो समय के साथ बढ़ती ही जातीं हैं और इनके साथ ही माँ-बच्चे का प्यार-दुलार भी बढ़ता जाता है शायद इसलिए ही तो माँ और बच्चे का रिश्ता दुनिया का सबसे करीबी,प्यारा और खूबसूरत रिश्ता माना जाता है।

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