मेरी छोटी सी माँ: मैं से माँ तक की कहानी

मेरी छोटी सी माँ: मैं से माँ तक की कहानी

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बच्चे मन के सच्चे, ये बात कितनी सही है। बच्चो की मासूम और निश्छल मुस्कुराहट कब थकान को उड़नछू कर देती है पता ही नही चलते। प्रेगनेंसी के समय मुझे बहुत चिंता रहती थी अपने लिए और अपने अजन्मे बच्चे के लिये भी। मुझे बहुत हेल्थ issues का सामना करना पड़ा। छोटे बच्चों से मैं हमेशा दूर भागती थी, उन्हें गोद में लेने से भी मुझे डर लगता था, आखिर वो दिन भी आया जब मेरी बिटिया मेरे हाथों में पहली बार आयी, रुई की तरह कोमल,यकीन मानिए उसे लेने में भी मुझे डर लग रहा था।

मैं आश्वस्त थी कि चलो प्रेगनेंसी का ये कठिन सफर खत्म हुआ, पर मुझे नही पता था कि आगे का सफर भी इतना आसान नही है। मेरी बेटी रात को कभी 2 बजे से पहले सोई नही, मैं सच में नींद के लिए तरस गयी | समझ में आ गया बच्चा पालना कोई आसान बात नही | मेरी माँ का या यूं कहूँ हर माँ का दर्द मुझे समझ में आ गया | कई बार तो दिन में तारे नजर आ जाते थे पर इन सबसे परे मेरी बेटी मेरी सबसे अनमोल सौगात है। भगवान की दी हुई सबसे बड़ी नेमत।

आज वो ढाई बरस की हो गयी | समय कैसे पंख लगा कर उड़ा पता ही नही चला | मेरी शादी बहुत दूर हुई, ससुराल तेलंगाना में तो पीहर राजस्थान में। बचपन से मां पापा की लाडली हूं कभी उनसे दूर नही गयी | आज भी जब अपने पीहर से वापस ससुराल जाती हूँ तो आँखें नम ही रहती है | पिछले साल मैं अपने पीहर से वापस अपने ससुराल जा रही थी, मेरी आँखें नम थीं | बहुत कोशिश करने पर भी खुद को रोक नही पा रही थी, मैं रोये जा रही थी | तभी मेरी पौने 2 साल की बेटी बड़े प्यार से मेरे पास आई और बोलने लगी, मम्मा क्या हुआ? फिर गाने लगी – “मैं फिर भी तुमको चाहूंगा, मैं फिर भी तुमको चाहूंगा।”

आँसू भरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी | वो दिन है आज का दिन, कभी भी मैं उदास होती हूँ या मेरी आँखों मे आँसू आ जाते है वो झट से मेरी माँ बन जाती है | मुझे सहलाती है और बोलती है मम्मा मैं हूँ ना, उसको बिल्कुल अच्छा नही लगता उसकी मम्मा के आंखों में आंसू आये।उसकी ये निश्छल औऱ मासूम अदा मेरी हर परेशानी को दूर कर देता है। अजीब है कैसे ये मासूम से बच्चे हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाते है। कही न कही मुझे लगता है कि वो लोग थोड़े से ज्यादा खुशकिस्मत होते है जिनके घर मे बेटियां होती है। माँ की परछाई, पापा की परी।

समझ नही आता इस समाज की मानसिकता बेटियो के प्रति ऐसी क्यों है, जो बेटी होने पर आँसू बहाता है। बहुत डर लगता है जब छोटी बच्चियों के साथ हो रहे जघन्य अपराधों की खबर अखबार में पढ़ती हूँ, सच मानिए कई बार बहुत समय लग जाता है वापस खुद को नार्मल करने में। आज जब लड़कियों ने खुद को हर जगह साबित कर दिया है फिर भी क्यों उन्हें हर जगह खुद के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। मुझे बेहद गर्व है कि मैं एक बेटी की माँ हूँ।

हर माँ से गुजारिश है कि वो अपनी बेटियों को कतई कमतर न समझे, जब ऐसी घटनाएं होती है तो हर माँ का चिंतित होना लाजमी हैं। इसलिए जरूरी है कि उन्हें छोटी उम्र से ही उन्हें सुरक्षा के गुर सिखाने शुरू कर दे उन्हें गुड टच बेड टच के बारे में बताए क्योंकि ये आज के समय की जरूरत है। उन्हें ओर कोई विधा में निपुण बनाये या न बनाये इसमें जरूर निपुण बनाये। बच्चे अपने माता पिता से ही सीखते है इसीलिए जरूरी है कि खुद को भी स्ट्रांग बनाये, ताकि बच्चे भी आपसे प्रेरित हो। गलत का विरोध करे और बच्चों के सामने एक उदाहरण बने। उम्मीद है आप मेरे विचारों से सहमत होंगे, आप अपने विचार कमेंट्स के रूप में शेयर कर सकते है।

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