माँ सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि समर्पण का नाम है

माँ सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि समर्पण का नाम है

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आज जिस बारे में मैं अपने विचार व्यक्त करने जा रही हूँ, वो आप सबके लिए शायद बहुत नया न हो, लेकिन आप इससे रिलेट कर सकते हैं। आज मैं अपने माँ बनने की यात्रा को आप सबसे शेयर करने जा रही हूँ। वैसे तो आज के इस समय में, हम सब चाहते हैं कि सब कुछ अच्छी तरह से सेटल हो जाने के बाद ही पैरेंट्स हों। लेकिन यह तो कुदरत का आशीर्वाद है, शायद कई बार हमें यह समझने में समय लगता है।
आखिर वो दिन आया जब प्रेग्नेंसी किट ने मेरे प्रेगनेंट होने की गवाही दी। शुरुआत में तो कुछ समझ नहीं आया, मिक्सड फीलिंग थी। मैं ठहरी एक गैर जिम्मेदार, अनुशासनहीन इंसान, जिसका सोना, खाना, काम करना या कुछ भी चीज ना समय पर थी, ना ही किसी तरह की जिम्मेदारी उठाने में कोई खुशी महसूस करती थी। ऊपर से थोड़ी महत्वकांक्षी, कैरियर ओरिएंटेड लड़की भी थी, लेकिन बस यही बात थी जो मुझमें खास थी। बाकी एक टिपिकल बीवी या बहू बनने वाली क्वालिटीज तो जैसे न के बराबर थी।
लेकिन माँ बनने की इस शक्ति और खूबसूरत सफर का एहसास मुझे जल्द ही समझ आने लगा था। होते होते 2 फिर 3 महीने हुए, शारीरिक बदलाव और मूड स्विंगस होने लगे। पहले तो लगा जैसे ये सब क्या हो रहा है; क्या मैं इस जिम्मेदारी को संभाल पाऊंगी? क्या मैं, मेरी माँ की तरह बहुत लविंग और केयरिंग माँ बन पाऊंगी? इस बीच एक कंटेंट राइटर के तौर पर मेरा कैरियर अच्छा चलने लगा था जैसे मुझे एक नई दिशा मिल गई थी। लिखना मेरा शौक ही नहीं प्यार भी था। एक सफल राइटर बनने की दिशा में अपने कदम आगे बढ़ना शुरू कर दिया था।लेकिन यह क्या एक अजीब सा मौड़ मेरी यात्रा में आ गया।
प्रेग्नेंसी के 4 महीने में, मेरे सर्विक्स में कॉम्प्लिकेशन आ गए। डॉक्टर ने कहा कि अब सर्विक्स बहुत कमजोर है कभी भी आपका गर्भपात हो सकता है। बेहतर यह होगा के मेडिकेशन पर रहो और फुलटाइम बेडरेस्ट पर रहो, आगे देखो क्या होता है। ये सुनकर ही मेरे कान जैसे सुन्न पड़ गए। मेरे साथ बैठे मेरे हसबैंड को तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि रिएक्ट कैसे करें। अपनी रोती हुई बीवी को संभालने या डॉक्टर से आगे के सभी स्टेप्स और सावधानियों को समझें।
बस फिर क्या था उस दिन का दिन था कि मेरा मन सब बदल गया। मैंने हर कोशिश जारी रखी कि कैसे भी ये बच्चा हमारी जिदंगी का हिस्सा बने। सबकी उम्मीदें, सपने जिंदा रहें। देखते ही देखते मेरी सारी हॉबी से मैं दूर होती गई। वॉकिंग, रनिंग, डांसिंग और राइटिंग ये सब मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा था। लेकिन जैसा की रेकमेंड किया गया था कि कोई भी भारी चीज नहीं उठाना, ज्यादा चलना फिरना या बहुत देर तक बैठना सब कुछ बंद था, क्योंकि प्रेगनेंसी बहुत रिस्की हो गई थी। मेरी सारी ऊर्जा सिर्फ और सिर्फ मेरे बच्चे को बचाने में लग गई। मैंने अपना सब कुछ साइड करके बस एक ही चीज पर ध्यान लगाया और उस दिन मैंने जाना के माँ होना सिर्फ एक एहसास नहीं है बल्कि एक त्याग, एक समर्पण का नाम है। ऐसा समर्पण अपने आप में पहली बार देखा था मैंने।
मेरी इस यात्रा को समझने के लिए धन्यवाद!
सभी मातृ शक्ति को मेरा प्रणाम!

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