माँ की ममता से मिली मेरी बेटी को पोषण की क्षमता

माँ की ममता से मिली मेरी बेटी को पोषण की क्षमता

माँ बनने का सफर हर औरत के जीवन का बेहद खूबसूरत सफर है, एक नन्हीं सी जान को नौ माह तक अपने गर्भ में रख पोषण व प्यार के स्पर्श से सींचना मुश्किल तो होता है परंतु इस कोमल सी जान के बाहों में आते ही माँ अपना हर दर्द भूल बैठती है फिर शुरुआत होती है एक नई सोच की

नयी सोच कि किस तरह उसकी देखभाल की जाए, उसके लिए क्या सही है और क्या गलत क्योंकि वो तो एक नवजात शिशु है, उसके साथ का हर दिन एक नया एक्सपीरियंस लेकर आता है एक माँ के लिए  कुछ यही सफर रहा है  मेरा दोबारा आठ साल बाद माँ बनने का, मेरी पहली बिटिया सात साल की हुई तब हमने दूसरे बच्चे के बारे में सोचना शुरू कर दिया था

जानती थी कि सब कुछ इतना आसान नहीं होगा क्योंकि बड़ी बेटी के समय आये कॉम्प्लिकेशनस की वजह से मेरी डॉक्टर ने सी सेक्शन के द्वारा मेरी डिलीवरी की थी जो कि आजकल शायद एक आम बात है, ऊपर से सिस्ट की दिक्कत, बढ़ती उम्र व दोनों बच्चों में काफ़ी अच्छा उम्र का गैप  सही डॉक्टर की सलाह से  मेरा इलाज शुरू हुआ और मैंने कंसीव कर लिया  शुरुआत के तीन माह निकालना बेहद मुश्किल हो गये थे हर समय मतलिया, कुछ खाने की इच्छा ना होना, मानों कि बस हवा पानी पर जी रही थी  चौथा माह शुरू होते ही तबियत में कुछ सुधार आने लगा था  धीरे धीरे समय निकलता जा रहा था, बच्चे की गर्भ में हलचल भी महसूस होने लगी थी  समय समय पर काफी अल्ट्रासाउंड भी हुए, सातवें माह में पता चला कि बच्चे का विकास बहुत धीरे धीरे हो रहा है, बच्चे तक पोषण नहीं पुहंच पा रहा था  आठवाँ माह जैसे तैसे पूरा बेडरेस्ट कर सावधानी से निकल गया था  बच्चे का वजन केवल 1800 ग्राम था यह जान मेरी टेन्शन बढ़ती जा रही थी, यह वजन तो मेरी बड़ी बेटी के जन्म के वजन से भी बहुत कम था परंतु एक अच्छी बात यह थी कि बच्चे की धड़कनें बिल्कुल सही थी जिसे देख डॉक्टर्स भी बेहद अचंभित थे  लगातार कम होते एमनिऑटिक फ्लुइड  इंडेक्स के कारण आठ माह के ऊपर केवल आठ दिन बाद ही डॉक्टर ने मेरी डिलीवरी कर दी

मुझे एक प्यारी सी, सुंदर सी फूल सी नाजुक बिटियां हुई, जन्म का वजन केवल 1840 ग्राम था, कुछ सेकंड्स दिखाने के बाद उसको नर्सरी आईसीयू  में शिफ्ट कर दिया था   मेरा मन बेहद चिंतित था, कुछ कुछ समय के उपरांत मैं और मेरे पति डॉक्टर से उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछते रहते  उसके होने के दूसरे दिन के बाद मेरा दूध उतरना शुरू हो गया था, मुझे डॉक्टर ने नर्सरी आईसीयू में बुला उसे स्तनपान करवाने को कहा परंतु वो इतनी कमजोर थी कि दूध खींच पाने में असमर्थ थी, तब ब्रैस्ट फीडिंग पंप की मदद से मेरा दूध निकलवा कर उसको इंजेक्शन के द्वारा दिया जाने लगा |

बिटियां को चार दिन निगरानी में रखने के बाद व उसके सारे टेस्ट ठीक आने के पश्चात डॉक्टर्स ने उसे घर ले जाने की अनुमति दे दी थी |

अब घर आने के बाद शुरुआत होने वाली थी कठिन समय की क्योंकि दोनों बेटियों को एक साथ जो देखना था, ऊपर से मैं बिल्कुल अकेली ना ही माँ ज़िंदा ऊपर से सासू माँ भी पिछले पांच सालों से बिमारी के चलते कुछ भी करने में असमर्थ थी, किसी भी रिश्तेदारों से मदद की उम्मीद लगाए बिना मैंने खुद ही उठ अपना वो समय निकालने का फैसला लिया

काफी मुश्किल समय था वो मेरे लिए एक तो मेरा शरीर कमजोर व साथ ही साथ छोटी बेटी की बेहद केयर जो करनी थी, मैं जानती थी कि उसे इंफेक्शन से बचाना बेहद जरूरी है तभी मैंने उसको केवल अपना दूध ही देने का निश्चय किया, मुश्किल था मेरे लिए परंतु इसमें मेरे पति ने  मेरा साथ दिया, उन्होंने मेरी डाइट का पूरा ध्यान दिया क्योंकि वो जानते थे कि मेरी रिकवरी होना बहुत जरूरी है व अच्छे खान पान से बच्ची को पर्याप्त मात्रा में दूध मिलेगा, धीरे धीरे मेरी बेटी का वजन बढ़ने लगा आज वो तीन माह बीस दिन की हो चुकी है व उसका शारीरिक व मानसिक विकास बिल्कुल सही रूप से हो रहा है डॉक्टर्स भी यह देख बेहद खुश है,क्योंकि उनके द्वारा पहले दिन से ही दी गयी यह सलाह कि माँ का दूध ही बच्चे का संपूर्ण विकास कर उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है को मान मैंने अपनी बेटी को ममता से पोषण दिया है और इसी ममता के कारण मेरे स्तनों में उसके लिए प्रयाप्त मात्रा में दूध आता है |

स्तनपान करवाना हर माँ को उसके बच्चे के लिए दिया गया भगवान का कुदरती उपहार है मेरे अब तक के इस सफर में मुझे काफी लोगों की बहुत सी बातें सुनने को मिली जैसे कि बेटी को बोतल की व पाउडर वाले दूध की आदत डाल दो अभी नहीं लेंगी तो आगे तुम्हे ही दिक्कत होगी काम नहीं हो पायेगा, बोतल से दूध पीयेगी ऊपर का तो आराम से सोयी रहेगी इसके इलावा पता नहीं तुम्हारे दूध से इसका पेट भरता भी है या नहीं कही भूखी तो नहीं रोती रहती या फिर तुम्हारा दूध आता भी है या नहीं और सबसे बड़ी बात जो सुनने को मिली कि बोतल का दूध लगाना बेहतर है क्योंकि कही बाहर आने जाने में बड़ी समस्या आती है हर जगह दूध पिलाने की जगह नहीं मिलती

यह बातें कहा तक उचित है, मानती हूँ कि बच्चे के लिए माँ का दूध पचाना सबसे आसान होता है और कई बार वो हर दस दस मिनट के बाद दोबारा डिमांड करता रहता है जो कई बार हमें तनाव में भी ले आता है परंतु अपने शिशु के बेहतर स्वास्थ्य को देख यह तनाव छूमंतर हो जाता है अगर हमारे शिशु के वजन में सही रूप से बढ़ोतरी हो रही है तो यह स्पष्ट है कि हमारे द्वारा कराया जाने वाला स्तनपान उसके लिए पर्याप्त हो रहा है  और कई बार ऐसा हो जाता है कि दूध सही व पर्याप्त रूप से आना कम हो जाता है जो कि सही समय व उचित खान पान से सुधारा जा सकता है

सबसे महत्वपूर्ण बात कि जब हम सेनेटरी पैड्स के बारे में खुल के बात कर सकते है उसके विषय में बनी फिल्म मूवी हाल में जाकर देख सकते है तो कहीं बाहर किसी अन्य जगह पर जाकर स्तनपान करवाने व स्तनपान करवाने के लिए कोई सुरक्षित जगह पूछने में कैसी शर्म क्योंकि यह तो हमारे शिशु की सेहत से संबंधित है और शायद ही किसी माँ के लिए अपने बच्चे की सेहत से बढ़ कर कुछ और होगा, स्तनपान कराना माँ और शिशु के बीच बॉन्डिंग बनाने का एक सुंदर जरिया है जो कि एक संपूर्ण माँ बनने की परिभाषा को पूरा करता है

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