पूतना – प्रेम ( बच्चों के मन पर डालता है बुरा असर )

पूतना - प्रेम बच्चों के मन पर डालता है बुरा असर

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कनिका को नए मोहल्ले में शिफ्ट हुए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे, इसलिए नए मोहल्ले में किसी को वो ज्यादा जानती नहीं थी। पूरे दिन घर को सेट करने के बाद वो शाम की चाय लेकर अक्सर अपनी बालकनी से खड़े होकर मोहल्ले में खेलते हुए बच्चों को देखती। शहर के भीड़ भाड़ वाले इलाके से हटकर ये मोहल्ला काफी शांत था।

एक शाम वो चाय लेकर अपनी बालकनी से मोहल्ले में खेलते हुए बच्चों को देख रही थी। आज ज्यादा बच्चे थे नहीं। तभी दो बच्चे, जिनकी उम्र लगभग पांच साल की होगी, खेलते हुए आपस में लड़ने लगे। एक बच्चे के शायद वो पापा ही थे, आते हुए दिखे। उन्होंने प्यार से अपने बेटे को गोद में ले लिए और उससे कुछ बाते करने लगे। दूसरा बच्चा जो वहीं खड़ा था, को अपने बच्चे के हाथों एक दो थप्पड़ लगवाए। जो बच्चा थप्पड़ खाया वो रोते-रोते अपने घर के अंदर चला गया। कनिका को ये सब देखकर काफी बुरा लगा। कनिका ने शाम को दीपक (कनिका का पति) के ऑफिस आने के बाद ये सब बात बताई। दीपक भी ये सब सुनकर कनिका को हिदायत दी कि वो अपने डेढ़ साल के बेटू को किसी के भरोसे न छोड़े या अकेले बाहर न जाने दे। कनिका भी थोड़ी सतर्क हो गई अपने बच्चे को लेकर।

कुछ दिनों बाद उसके घर दो लेडीज आई, साथ में वही उस दिन वाले बच्चे भी उनके साथ थे। कनिका उन्हें बैठाई और नाश्ता करवाने लगी। ये लेडीज सुनीता और रमा थीं। दोनों बच्चों की माँ थीं और आपस में सहेलियां। दोनों बच्चोंं का नाम टुकु और मुनमुन था।

मुनमुन, जो सुनीता का बेटा था, ने ही उस दिन अपने पापा के गोद से टुकु को मारा था। लेकिन अभी ऐसा लग रहा था कि सुनीता ही टुकु की असली माँ है, वो दोनों बच्चों को साथ में बैठा कर खेल रही थी।

ये देख कर कनिका, पास बैठी रमा से बोली – “एक दिन मैं अपनी बालकनी से दोनों को आपस में लड़ते हुए देख रही थी।” तभी सुनीता ने बात काटते हुए कहा – “हाँ हम अक्सर एक दूसरे के घर अपने बच्चे को छोड़ देते हैं, बच्चे साथ खेलते रहते हैं। आप भी अपने बेटे को हमारे पास छोड़ सकती हैं”|

फिर रमा बोली – “हाँ, कनिका वैसे भी मेरा टुकु इनका ही दत्तक पुत्र है।”

कनिका आश्चर्य से सुनीता के तरफ देखी – “अरे नहीं ये बस मजाक कर रही थी। दरअसल ज्यादातर समय टुकु मेरे घर रहता है इसलिए ये ऐसा बोल रही हैं।”

कनिका की नजरों के सामने उस दिन की घटना दौड़ गई। लेकिन वो अब चुप रहना ही बेहतर समझी। सुनीता अब अक्सर कनिका के घर आती, कनिका का बेटू भी उसे थोड़ा बहुत पहचानने लगा था। इसी बीच एक मजेदार वाकया हुआ। सुनीता बेटू के प्रति भी अपने अथाह प्रेम को दिखाती थी, एक दिन वो अकेले ही कनिका के घर आई। कनिका को कुछ काम था, वो सुनीता को बोली कि थोड़ी देर वो बेटू को संभाले छत से कपड़े लेकर आ रही है।

सुनीता बोली – “आप चिंता नहींं करो, आप आराम से अपना काम करो।”

कनिका कभी बच्चे को उसके हवाले नहीं करती थी, लेकिन आज मजबूरी थी तो वो छत पर चली गई। तभी थोड़ी देर में बच्चे के रोने की आवाज आई और साथ में सुनीता के भनाभनाने की। कनिका उल्टे पैर छत से भागी तो देखती है कि सुनीता बेटू को नीचे सुलाई हुई है और अपना वो हाथ धो रही है क्योंकि बेटू ने पॉटी कर दी थी।

बेटू रोते हुए

सुनीता कनिका को देख बोली- “देखो न तुम्हारे बेटू को गोद में लिया ही था कि उसने पॉटी कर दी। मैं जल्दी से गोद से उतारी तो इसी में ये थोड़ा गिर गया और रोने लगा।”

कनिका की आँखों के सामने उस दिन की घटना याद आ गई। वो चुपचाप बेटू को गोद में लेकर उसे साफ की और चुप कराने लगी। क्योंकि सुनीता से वो क्या उम्मीद कर सकती थी जो सिर्फ प्रेम का दिखावा ही करती है। सुनीता भी थोड़ी देर बाद वहाँ से चली गई।

कनिका को सुनीता का ये प्रेम, पूतना के उस प्रेम की तरह ही लगने लगा, जिसमें वो कृष्ण को सिर्फ दिखावा के लिए दुलार करती है। लेकिन उनका मकसद कुछ और होता है।

दोस्तों, आज के युग में एकल परिवार के बढ़ते प्रचलन ने हम सब कुछ अकेले करने के आदि हो रहे हैं, उसमें कोई जान पहचान या किसी की मदद मिल जाती है तो हमें उस पर अथाह विश्वास होने लगता है। लेकिन हमें इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि हमारा ये अथाह विश्वास हमारे बच्चे के लिए कहीं गलत ना साबित हो। क्योंकि बच्चों का मन बहुत नाजुक होता है, उनके साथ ऐसा दोगला व्यवहार उनके मन पर काफी बुरा असर डाल सकता है।

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