तू खुलकर मुस्कुरा कर जी ले ज़रा अपने आज में

तू खुलकर मुस्कुरा कर जी ले ज़रा अपने आज में
कितना अजीब है ना इंसान ! ताउम्र अपनी जिम्मेदारियों के तले दबे रहता है और खुद की ज़िन्दगी जीना भूल जाता है। इंसान अपनी जिम्मेदारियों को अपने सपने का नाम देता है, और इन सपनों को पूरा करने में पूरी ज़िन्दगी गुज़ार देता है। इंसान सोचता है सारी ज़िम्मेदारी निभाने के बाद मैं अपनी ज़िन्दगी जियूँगा। लेकिन इन सब में काफी लंबा समय लग जाता है और इंसान को बुढ़ापा आ जाता है। सोचता है अब ज़िम्मेदारी खत्म, अब मैं अपने लिए जियूँगा। लेकिन बुढ़ापे की उम्र में आखिर कौन मजे कर पाता है। बुढ़ापे में तो आकर उसका शरीर जवाब देने लगता है। और फिर वो खुद को कोसने लगता है कि काश उसने खुद के नाम की ज़िन्दगी समय रहते जी ली होती।
ऐसा ही कुछ हुआ ‘दयाराम जी’ के साथ। ‘दयाराम जी’ एक नेक और ईमानदार सरकारी कर्मचारी थे। आमदनी इतनी की दो समय की रोटी आराम से खा सके लेकिन सेविंग्स ज्यादा नहीं हो पाती थी क्योंकि उनके कंधों पर पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी जो थी। बच्चों के लालन पालन में, उनके अच्छे विद्यालय में दाखिला कराना, घर का खर्च उठाना, सबकी ख्वाइश को पूरा करना आदि इन सब खर्चे के वजह से कम ही सेविंग हो पाती थी। और इन ज़िम्मेदारियों को उठाते उठाते वो अपनी ज़िन्दगी जीना कहीं भूल से गए थे। हमेशा ये सुनने को मिलता कि बच्चे थोड़ा बड़े हो जाए तब अपने लिए थोड़ा समय निकालूंगा। बच्चो की पढ़ाई के बाद उनकी जॉब लगने तक, जॉब लगने के बाद उनकी शादी होने तक सब ज़िम्मेदारी निभाते चले गए लेकिन खुद के लिए एक दिन भी ना निकाल सकते थे। आखिर ज़िम्मेदारी जो पूरी निभानी थी। इसी तरह वो पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी निभाते गए। दिन महीनों में, महीने सालों में तब्दील हो गए लेकिन एक पल भी चैन की सांस नहीं ले रहे थे।
आज आखिर वो दिन आ ही गया जब ‘दयाराम जी’ ने अपने साठ वर्ष पूरे कर लिए और रिटायरमेंट लेने के साथ ही अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर लिया। अब जाकर आया है वो वक़्त जब वो अपने लिए जी सके। लेकिन साठ वर्ष की उम्र में इतनी ताकत इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वो आराम से एक दिन भी अपने लिए जी पाए। बुढ़ापा आते ही उनकी तबियत लड़खड़ाने लगी थी। कई लाइलाज बीमारियों ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया था। उनका शरीर उनका साथ छोड़ने पर उतारू था, और कुछ दिन बाद ही उनका देहांत हो गया। ‘दयाराम जी’ जो ज़िम्मेदारियों के नाम पर खुद के लिए एक दिन ना जी पाए आज वो इस दुनिया को अलविदा कह कर चल दिए।
देखा न आपने, ये कहानी सिर्फ ‘दयाराम जी’ की नहीं है बल्कि हम सबके घर की कहानी है। हर इंसान यही सोचता है कि अभी तो बहुत सारी ज़िम्मेदारी है सर पर और जब तक सारी ज़िम्मेदारी पूरी न हो जाए चैन की सांस नहीं ले पाता, और इन जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते बुढा हो जाता है पर फिर भी अपने लिए नहीं जी पाता।
हम अपने भविष्य के चक्कर में अपना वर्तमान जीना भूल जाते है। भविष्य के प्रति हमारी चिंता उचित है लेकिन उसके लिए खुद का वर्तमान खराब करना उचित नहीं है। ऐसी ज़िन्दगी का भी क्या फायदा जब इंसान खुद के लिए एक पल ना जी सके।
आप भी एक बार जरूर गौर करियेगा कहीं आप भी अपनी ज़िम्मेदारियां निभाते-निभाते खुद को भूल तो नहीं गए। कहीं आप भी अच्छे भविष्य के लिए अपना वर्तमान तो नहीं खराब कर रहें । समय रहते इन बातों को समझे और अपने आज में जिएं । आज बेहतर होगा तभी कल भी बेहतर होगा।

धन्यवाद!



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