कुछ ऐसे अहसास जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता हैं।

कुछ ऐसे अहसास जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता हैं

माँ बनने के सुखद अहसास को शायद ही कोई शब्दों में पिरो पाया है। ये वो खुशी है जिसको शब्दों में बयां ही नहीं की  जा सकती। सिर्फ महसूस की जा सकती है जैसे मेरा ये अहसास जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है उसे बयां करने की कोशिश कर रही हूँ।



उस रात को अचानक पेट में हल्का सा दर्द उठा, नवां महीना पूरे हुए दो दिन हो गए थे। आज मुझे थोड़ा-थोड़ा दर्द का अहसास हुआ तो माँ ने कहा हिम्मत रख सब ठीक होगा। दर्द कम ही था तो सुबह होने का इंतजार किया। सुबह होते ही मुझे अस्पताल ले गए, कुछ जाँच करके भर्ती किया गया। मुझे बहुत डर भी लग रहा था, पर माँ बार-बार हौसला दे रही थी, मेरे पति भी साथ ही थे, वो भी क्या बोलते उनका भी तो  पहला अनुभव था।



उतने में ससुराल वाले भी आ गए। मुझे दर्द कम था तो डाक्टर ने इंतजार करने को कहा और दर्द का इंजेक्शन भी लगाया। इस बीच वार्ड में और भी गर्भवती महिलाएं आई। कोई तेज दर्द में आई और कुछ देर में उनका बच्चा हो गया तो कोई तेज दर्द में तड़प रही थी, किसी को लड़का हुआ है तो किसी के लड़की, किसी को होने वाला है तो किसी को हो गया।

मैं भी ये सब देख सुन रही थी | मेरे मन में भी डर और सवाल चल रहे थे कि क्या होगा, कैसे होगा, पर जब शाम तक मुझे दर्द नहीं हुआ तो डॉक्टर ने ऑपेरशन की सलाह दी। सबकी सहमति सेऑपेरशन हुआ। मैंने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। जब मुझे इस बात का पता चला तो मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था क्योंकि मुझे और मेरे पति को बेटी ही चाहिए थी |




मैं पूरी तरह से होश में नहीं आई थी। जब होश में आई तब तक सब चले गए थे सिवाय मेरी माँ के। अब मैंने अपनी बेटी को गोद में लिया, उसे निहार रही थी। नन्हें-नन्हें से हाथ पैर छु रही थी। उसके माथे को चुमा।ऑपेरशन से हुई थी तो माँ ने ज्यादा देर लेने से मना किया और उसे मेरे पास सूला दिया। मेरे पास शब्द नहीं थे कुछ कहने को पर मैं बहुत खुश थी। बताना चाहती थी सबको कि ये मेरी बेटी है मैंने इसको जन्म दिया है जैसे कि मैं कोई पहली महिला हूँ जिसने यह काम किया है |

मन मयूर सा नाच रहा था, आज से पहले ऐसी खुशी महसूस ही नहीं की थी मैंने। सब सो रहे थे पर मेरी आँखों में नींद ही नहीं थी। बस सारी रात अपनी बेटी को निहार रही थी। कुदरत के इस अनुपम उपहार पर आश्चर्य कर रही थी। मन तो कर रहा था अपनी बेटी को गोद में उठा कर नाचूं , गाऊं, सबको बताऊ कि मैं माँ बन गई.. हाँ  मैं “माँ” बन गई… ।





मैं बस अपनी बेटी को देख रही थी और सोच रही थी कल तक ये मेरे अंदर थी महसूस करती थी हर पल इसे आज मेरे सामने है। नौ महीनों का हर दिन आँखों के सामने आ गया हो जैसे।कई महीनों की उलटी तो कभी कुछ ऐसा खाने का मन जो बस अभी का अभी खाना होता। माँ का हर घंटे कुछ न कुछ खाने को देना। तुझे हर दिन अपने अंदर बढ़ते महसूस करना। अकेले में तुम से बातें करना| तुम्हारा मुझे लात मारना। हर महीने फिर हस्पताल आकर तेरे दिल की धड़कन सुनना।  मुझे ना इस करवट सोने देना ना उस करवट। शैतान ! और आज मेरे सामने मासूम सी प्यारी सी “मेरी बेटी”।

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