ऐ स्त्री! आखिर तुझे भी तो हक है जीने का

ऐ स्त्री! आखिर तुझे भी तो हक है जीने का

आजकल स्त्री की दिनचर्या – सुबह उठते ही मानो दौड़भाग शुरू हो जाती है जो रात तक रुकने का नाम ही नहीं लेती। सुबह से रात तक बस घर के कामों में इतना व्यस्त हो जाती है कि अपने लिए समय निकालना तो जैसे पाप हो जाए। सुबह आँख खुलने से ही रात आँख बंद होने तक सिर्फ घर के कामकाजो में ही आज स्त्री खुद को इतना उलझा देती है जैसे कि घर के काम के अलावा जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं।

मैं जानती हूं शादी के बाद हर स्त्री की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। लेकिन शादी के बाद वो अपने जीवन को इस तरह जीने लगती है जिसमें उसको खुद के लिए ही समय नहीं मिल पाता। वो पूरी दुनिया से कट कर सिर्फ अपने परिवार को ही पूरी दुनिया बना देती है। लेकिन इस तरह सबसे खुद को दूर रखना क्या सही है। खुद के लिए जीना क्या गलत है। अगर पति और बच्चों को और घर में रह रहे हर एक सदस्य को जिंदगी जीने का हक है तो आप क्यों खुद को पीछे रखती हैं।

ये तो हम सब जानते हैं कि घर का काम तो चलता ही रहता है वो तो कभी नहीं बदलेगा तो क्यों ना आप खुद को ही बदलें। आप भी अपने लिए समय निकालें। इस चार दिवारी से बाहर निकलिए। थोड़ा अपने लिए भी सोचिए । कुछ अपने मन की भी करो क्योंकि कभी-कभी अपने लिए सोचना गलत नहीं है। ये आपकी जिंदगी है, आपको ही अपने लिए सोचना है। खुद को यूं बेवजह बांध के ना रखें। जिंदगी सिर्फ एक बार मिलती है, उसे इस तरह जियो की जाते-जाते खुशहाल जिंदगी ना जीने का कोई पछतावा ना रहे।

मैं ये नहीं कहती कि अपनी जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ दो बस इतना कहना है कि अपनी जिंदगी को भी खुशनुमा बनाइए । आप भी एक इंसान हैं । आपको भी हक है अपने लिए जीने का। आपको भी हक है खुश रहने का। आपको भी हक है सपने देखने का। आप हकदार हैं हर वो चीज की जिसका हर दूसरे इंसान को हक है।

देखिए, जिंदगी बहुत खूबसूरत है। इस खूबसूरत जिंदगी को जीने के लिए बहाने ढूंढिए। बाहर निकलिए। लोगों से मिलिए। मुस्कुराएं, घूमे-फिरें, झूमे, नाचे-गाएं । जो मन करता है वो करें। बस अपनी बेरंग सी जिंदगी को रंगीन बनाइए ।

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