एक बच्चे के साथ ही एक माँ का भी जन्म होता है

एक बच्चे के साथ ही एक माँ का भी जन्म होता है

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मुझे आज भी वो दिन याद है जब मुझे पता चला – मैं माँ बनने वाली हूँ। कितनी खुश थी मैं। एक अल्हड़ लड़की ये सुन अचानक जिम्मेदार बन गई थी। खुद का खूब ध्यान रखने लगी थी क्योंकि उसके अंदर एक नन्ही सी जान थी। 8 महीने वो नए-नए अनुभव…कितना उत्साहित करते थे। जैसे ही 9वां महीना शुरू हुआ, मेरी बेचैनी और डर दोनों बढ़ने लगे। मैंने सुन रखा था कि बहुत दर्द होता है।
वो दिन भी आखिर आ गया जब मुझे लेबर पेन होने लगा। काफी दर्द के बाद वो नन्ही परी मेरे हाथों में थी और मैं सारा दर्द भूल उसे निहार रही थी।
अब तो जैसे नींद क्या है भूल ही गई। बेटी की परवरिश में जी जान से लग गई मैं। जैसे-जैसे बेटी बड़ी हो रही थी मेरी जिम्मेदारी भी बढ़ती जा रही थी।
मैं सोचती थी जब वो चलने लगेगी तो राहत होगी लेकिन ये क्या, अब तो मुझे जब तक वो जगी रहती बिल्कुल आराम ना मिलता।

बड़ी हुई तो उसकी पढ़ाई, उसकी सेहत, उसकी सुरक्षा की फिक्र फिर, उसकी शादी, उसकेे सुखी जीवन की फिक्र

आज अपनी बेटी के बेटे को गोद में लिए मैं यही सोच रही थी कि सच, एक माँँ को कभी चैन नहीं मिलता। एक माँ का जीवन हमेेेशा अपने बच्चे की फिक्र में ही निकल जाता है।

आज, एक माँ का फिर जन्म हुआ है। हाँ, सच ही तो है एक बच्चे के साथ एक माँ का भी जन्म होता है और तब ही वो समझ पाती है अपनी माँ की फिक्र का कारण।
आज मैं खुश हूँ कि मेरी बेटी एक माँ बन गई लेकिन फिर से एक माँ की फिक्र स्टार्ट हो गई…क्या मेरी बेटी ये जिम्मेदारी ठीक से निभा पाएगी। सच एक माँ को कभी चैन नहीं मिलता।

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