अब नहीं सीखेगा तो कब सीखेगा?

अब नहीं सीखेगा तो कब सीखेगा?

कल एक शादी में जाना हुआ, पतिदेव के मित्र भी परिवार समेत थे। गाड़ी में मेरी दो साल की बेटी आगे से पीछे कर रही थी कि मुझे कुछ अजीब सी स्मेल आई । मैंने बेटी से पूछा “बेटा पॉटी आयी?” मेरी बेटी जो अभी पूरा बोलना नहीं सीखी उसने अपनी तोतली ज़बान में सिर्फ इतना कहा “ना ना” और फिर खेलने में मशगूल हो गई ।

अब उनके मित्र की पत्नी के निशाने पर मैं थी “हाय हाय, दो साल की हो गई अभी भी बताती नहीं है सु सु-पॉटी के बारे में?”

मैंने कहा “नहीं, हो जाने के बाद बताती है”।

“इतनी बड़ी हो गई (मुझे तो आज ही पता चला कि हाय मेरी बेटी बड़ी भी हो गई..??) अब तो बताना चाहिए ना। मेरी बेटी तो सवा साल की उम्र में ही सीख गई थी। मैंने तीन चार दिन उसे बताया कि सु सु-पॉटी आए तो मम्मा को बताना। शुरू में नहीं बताया, एक दिन दो झापड़ लगा दिए। तब से आज तक हमेशा बताती है।” भाभीजी ने अपना अनुभव मुझसे बांटा।

“हाँ, पर अभी बोलना नहीं सीखी ना (अब ये अभी तक बोलना नहीं सीखी इसका भी बुरा उन भाभी जी और मेरे कई शुभचिंतकों को लग रहा है) और कोशिश तो हमने भी बहुत की है पर अब जब वो नहीं बोलती तो क्या कर सकते हैं। धीरे धीरे सिख जाएगी।” मैंने हो सके उतनी नरमी से बात की।

“तो क्या हुआ बोलना नहीं सीखी। इसमें तो दो शब्द बताने होते हैं। अभी कुछ महीनों में स्कूल जाने लगेगी। फ़िर वहाँ से शिकायतें आएगी की आपकी बेटी ने पॉटी की है। कितना गंदा लगता है इतने बड़े बच्चे ना सीखे तो।” उनकी बातें सुन मेरा दिल बैठा जा रहा था कि जिस ज़िगर के टुकड़े को उसकी शैतानियों की वजह से हम बड़े नहीं होने देना चाहते उसे ये मोहतरमा जबरदस्ती बड़ा ही घोषित करती जा रही है।

“हाँ ! बात तो आपकी सही है पर मुझे अभी स्कूल नहीं भेजना। जब वो बोलने लगेगी तब अपने आप बताएगी। अब मारकर ही तो बच्चों को सब कुछ सिखाया नहीं जाता ना” मैंने थोड़े से कड़े आवाज़ में अपनी आखरी सफाई पेश की (क्योंकि दिमाग का बॉयलर अब किसी भी वक़्त फटने की कगार पर था) पर लगता था उन भाभीजी के हथियार अभी कम नहीं हुए थे।

“अरे बच्चों को ये सब अभी से सिखाना पड़ता है। जल्दी सिख जाए तो हम भी तो फ्री हो जाते हैं। और ऐसे किसी के घर पर जाकर कपड़े गंदे करे तो कितना शर्मिंदा होना पड़ता है। सिखाओ कुछ अपनी बेटी को।” मुझे आज ही पता चला कि मेरे मासूम से फूल की वजह से मुझे शर्मिंदगी भी उठानी पड़ सकती है।

ड्राइव कर रहे पतिदेव ये सब सुन रहे थे। पत्नी का दर्द और बेटी को दिए जानेवाले उलाहनें शायद उनकी बर्दाश्त के बाहर थे। उन्होंने ही जवाब दिया ” भाभी अगर बच्चे इतने जल्दी ही सब सीख जाते तो फिर माँ-बाप की क्या ज़रूरत? आज नहीं तो कल सीख  जाएंगे। ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, डायपर का ख़र्चा बढ़ेगा। मैट्रेस गंदे करेगा तो नए आ जाएंगे। जब हम इतना सब ख़र्चा अपने ऊपर कर सकते हैं तो बच्चे के लिए और ज्यादा ही सही। और हमें कोई जल्दी नहीं अपनी बेटी को बड़ा करने की।” मिरर से उन्होंने मेरी ओर देखा और आंखों से ही जैसे कहा कि तुम चिंता मत करो लोगों की बातों से। मैं हूँ ना तुम दोनों के लिए। यकीन मानिए इतना सुकून मिला।

दूसरा एक किस्सा बताती हूँ। सोसाइटी के गार्डन में बेटी को लेकर खेलने जाती हूँ। एक दिन दूसरे विंग की एक सहेली मिली जिसका बेटा अभी तीसरी कक्षा में पढ़ता है। मेरी बेटी झूले से मस्ती कर रही थी और मैं संभालने की कोशिश। उतने में सहेली ने कहा “इसे कुछ सिखाती भी हो या नहीं?” मैंने पूछा क्या सिखाना है?”

“अरे ABCD ऐसा कुछ सिखाओ। अब बड़ी हो रही है फिर कब सीखेगी। थोड़ी मेहनत अभी से किया करो, घर पर ही तो रहती हो। कल को स्कूल भेजोगी तो फ़िर दूसरे बच्चों से पीछे रह जायेगी।” मोहतरमा ने आज ही मेरी गुड़िया को कॉम्पिटिशन की रेस में शामिल कर दिया।

“नहीं मैंने इसे ABCD नहीं सिखाई और सिखानेवाली भी नहीं। मैं उसे खुद से ख़ाना ख़ाना सिखा रही हूँ। मग से दूध पीना सिखा रही हूँ। खाने के बाद अपनी प्लेट किचन में रखना सिखा रही हूँ। सुबह शाम मंदिर में पूजा करते वक़्त अपने पास बैठना और भगवान को हाथ जोड़ना सिखा रही हूँ। अपने खिलौने खुद समेटना सिखा रही हूँ। हालांकि वो कितना सीखी वो उसके मूड पे डिपेंड करता है, मैं तो सिर्फ कोशिश करती हूँ। बाकी ये पढ़ाई वढाई के लिए भी मैं ही मेहनत करूँगी तो स्कूलवाले क्या करेंगे।” मैंने दूसरे ही पल अपनी बच्ची को उस कॉम्पिटिशन से बाहर कर दिया।

मेरी नन्ही परी

मुझे काफी पुराना किस्सा भी याद आया जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी और एक दिन दीदी की बेटी को स्कूल पिकअप करने गई थी। तब वो शायद नर्सरी में थी। बाहर खड़ी मम्मियां एक दूसरे से बातें कर रही थी ” यार देखो ना ये स्कूलवाले किताबें भी घर पर नहीं देते। अब बच्चों को कुछ पढ़ाना हो तो कैसे पढ़ाएं?” दूसरी माँ बोली ” अरे मैंने तो किताबों का एक सेट ख़ुद से खरीद लिया है। घर पर उसी से पढ़ाती हूँ। घर पर ना पढ़ाओ तो बच्चे स्कूल से आकर किताबों को हाथ भी नहीं लगाते।” मैं वहाँ खड़ी खड़ी सोच रही थी 3-4 साल के बच्चों को पढ़ाकर इन्हें क्या आज ही नासा के उपग्रह पर भेजना है? मन तो किया की कहूँ बहन जी आप बच्चा पेट में था तब से पढ़ाई शुरू कर देती तो अब तक तो वो मंगल मिशन पार कर चुका होता। और गुस्सा तो इतना आया कि ऐसी माँओं को मंगल पर भेज देना चाहिए, वो भी बिना दानापानी के।

मुझे समझ नहीं आता हम किस दिशा में जा रहे हैं? किस कॉम्पिटिशन में अपने बच्चों को डाल रहे हैं? किस जगह 2-3 साल का बच्चा पीछे रह जायेगा? क्यों हम उनसे उनका बचपन छीन रहे हैं?

ऐसे हालातों से मुझ जैसी कई माँऐं गुज़री होंगी जहाँ माँ-बाप से ज़्यादा दुनियावालों को चिंता है कि ये नहीं आता, वो नहीं आता, कब सीखेगा? बाद में परेशानी होगी वगैरह वगैरह..आपका बच्चा अभी बैठना नहीं सीखा, मेरा तो 5 महीनें में बैठने लगा था, अभी चलना नहीं सीखा, मेरा तो दस महीने में चलने लगा था, अभी तक बोलना नहीं सीखा, मेरा तो डेढ़ साल में सब कुछ बोलने लगा था। अभी तक फीडिंग करवा रही हो, मैंने तो एक साल में ही छुड़वा दिया था। अभी भी बोतल से दूध पी रहा है, मैंने तो कभी बोतल नहीं दी। अभी तक ख़ाना नहीं सीखा, मेरा तो माँ के पेट से ही दांत लिए पैदा हुआ था और पता नहीं क्या क्या।

ऐसे वाहियात सवाल करने से पहले लोग ये क्यों नहीं सोचते कि वो एक माँ को कितना आहत कर सकता है? ये क्यों नहीं समझते कि सब बच्चे एक जैसे नहीं होते, कोई कुछ जल्दी सीखता है तो कोई कुछ और जल्दी सीखता है। और अंततः उम्र के हिसाब से हर बच्चा अपनी क्षमता अनुसार सब कुछ सीख ही जाता है। सब कुछ जल्दी सीखकर कौनसे झंडे गाड़ने हैं हमें?

हर माँ-बाप अपने बच्चों को श्रेष्ठ देने और सिखाने की कोशिश करते हैं पर ज़रूरी नहीं कि बच्चा आपकी हर ख्वाहिशों पर ख़रा उतरे। उन्हें उनका बचपन जीने दें। आपकी सहूलियत और जल्दी फ्री होने के चक्कर में बच्चों को समय से पहले बड़ा कर देना कहाँ तक उचित है? बच्चों को सुविधाएं कम देंगे तो चलेगा पर उन्हें उनका बचपन लौटा दीजिये।

मेरी बेटी 2 साल की हो चुकी है फिर भी हम दोनों पति पत्नी को लगता है कि हमारी लाडली बहुत जल्दी बड़ी हो गई । कहाँ वो बेड में पड़े पड़े हमें देख मुस्कुरा देती थी। उसकी पहली स्माइल की फ़ोटो अभी भी मोबाइल के स्क्रीन पर है। जब पहली बार घुसकना  सीखी थी। जब पहली बार उसने चलने के लिए कदम उठाया था, पहली बार अपनी मम्मा का पजामा या पापा का पेंट पकड़कर खड़े होने की कोशिश की थी। पहली बार दहीं खाने के बाद जो मुंह बनाया था। पहली बार जब मम्मा पापा बोली थी। कितने हसीन लम्हें थे वो जब ये सब पहली बार हुआ था। फिर क्यों मैं चाहूंगी कि मेरी बेटी जल्दी जल्दी सब कुछ सिख जाए। उसके साथ तो हमें अपना बचपन जीने का मौका दुबारा मिलता है। कृपया उसे हाथ से जाने ना दें।

दुनिया के लिए वो भविष्य में कॉम्पिटिशन की रेस में दौड़नेवाला घोड़ा हो सकता है पर हमारे लिए वो सिर्फ हमारा बच्चा है। उसे बच्चे की तरह ही बड़े होने दीजिए। क्योंकि बचपन कभी लौटकर नहीं आता। और किसी भी माता-पिता से ऐसे सवाल करने से खुद को रोके की ये क्यों नहीं और वो क्यों नहीं। बच्चा उनका अपना है, उन्हें तय करने दीजिए कि वो किस तरह की परवरिश देना चाहते हैं अपने अंश को।

नई माँओं से भी कहना चाहूँगी की लोगों की बातों को ज़रा सी भी तवज्जो ना दें। हो सके तो उसे अनसुना कर दें और नहीं सुन सकते तो करारा जवाब उसी पल दे दे ताकि अगली बार कोई आपको आपके बच्चे की कमियाँ न गिनवाए।

अगर आप भी ऐसे कुछ अनुभवों से गुज़री है तो हमसे कमेंट सेक्शन में जाकर हमसे बांटिए और आर्टिकल पसंद आया हो तो लाइक, और शेयर करना ना भूलें।

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