अपनी मातृभाषा बोलने मे शर्म कैसी,एक माँ कि कोशिश-एक लघु कथा।

अपनी मातृभाषा बोलने मे शर्म कैसी,एक माँ कि कोशिश-एक लघु कथा।

मनोरमा अपने  10साल के बच्चे शरद  को कब से समझा रही है,कि वो अपने स्कूल मे वाद विवाद प्रतियोगीता मे भाग  ले। इसके पीछे वजह यह है कि प्रतियोगीता हिन्दी मे है।सही पढा आपने हिन्दी में ।

मनोरमा के बेटे  का मानना है कि अगर भाग लेना ही है तो अंग्रेज़ी मे होने वाली प्रतियोगीता मे ले ,हिन्दी तो बिल्कुल नही,नही कभी नही।इसके पीछे भी उसका कारण जान लिजिये,उसका मानना है कि हिन्दी बोलने मे वो असहज,मतलब शर्म मेहसूस करता है। क्युंकि उसका उठना बैठना हाई सोसाइटी के लोगो मे है ,तो वहा पर सब लोग अंग्रेज़ी मे ही बात करते हैं।

समझाते समझाते शाम हो गई,पर बेटा राहुल,वो तो बस यही कह रहा है,”नो,मम्मा,नो,हिन्दी नेवर”।

उसे अपने पढ़ाई  के दिन या गये, वो भी अपने स्कूल मे मेधावी छात्रा रही है ।उसने स्नातकोत्तर भी हिन्दी से किया था। फिर भी वो ही अपने  बेटे को मना नही पा रही है।वो भी अपने स्कूल व कॉलेज में कवितायेँ लिखती थी, स्नातकोत्तर करने के बाद उसके  कई कविता-संग्रह प्रकाशित हुए,काफी नाम था उसका।

आज उसी का बेटा हिन्दी बोलने मे शर्म मेह्सूस करता है,उसे बहुत दुख हुआ ये जान कर कि आज कि पीढी हिन्दी बोलने मे शर्म मेहसूस करती है।

उसे  कुछ समझ नही आ रहा था कि वो अब क्या करे।वैसे वो अपने बेटे पर प्रतियोगिता के लिये ज़ोर नही देना चाह्ती थी ,पर अपनी भाषा का इस प्रकार अपमान भी उसे मंजूर नही था।हर भाषा का अपना मह्त्व होता है,शरद को ये समझना भी जरुरी था।

पर कैसे ??

अचानक अगले दिन उसे एक उपाय सूझा,वह अपने बेटे  के पास गई और बोली,कि ठीक है अगर तुम्हे प्रतियोगिता में  भाग नही लेना है तो ठीक है,कोई बात नही,  पर कल तुम मेरे साथ मेरे कॉलेज के बाद मार्किट चलना। तुम्हारे  लिये कुछ कपडे और अंग्रेज़ी कि अच्छी किताब ले लेती हू।शरद भी मान गया।
अगले दिन शरद अपनी माँ के साथ उनके कॉलेज जाने को तयार हो गया।

मनोर्मा स्नातकोत्तर कॉलेज मे प्रवक्ता थी,प्रधानाचार्य से permission ले कर वो शरद को अपने क्लास के लेक्चर मे अपने साथ ले गई, क्युंकि वो हिन्दी विषय कि प्रवक्ता थी,तो उनके सभी लेक्चर शरद ने सुने,और हिन्दी भाषा कि महानता और महत्वता से प्रभावित हुआ। सारे छात्र  छात्रा भी बडे चाव से मनोर्मा के लेक्चर सुन रहे थे व क्लास मे अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे,मनोरमा बडे शालीनता से  सबको उनके विचार सुन रही थी व अपनी बात बता रही थी।  शरद हिन्दी के  लेखकों,कवियों के बारे मे जान कर अचरज से भर जाता कि जिस भाषा को वो बोलना नही चाहता उसे लोगो ने एक ऊँचे  मकाअम तक लाये ।आज भी कितने लोग इसमे शोध कर रहे हैं।

उसे अपनी सोच पे शर्म आई,कि वो अपनी मातृभाषा का  अपमान, करता है। फिर कोलज से  छूट कर,वह बजर गया तो मनोर्मा ने देखा कि शरद अंग्रेज़ी के बाजए हिन्दी कि किताब ले रहा है,उसने अंग्रेज़ी कि भी किताबें ली।

उसने  मनोर्मा से अपनी कही बात के लिये माफी मांगी,और अपने स्कूल मे प्रतियोगिता मे भाग लिया, और वह वाद विवाद प्रतियोगिता में अपने राज्य से जीत के आया।

दोस्तो ,ये तो बस कहानी है,पर हमे अपनी मातृभाषा  चाहे वो कोई भी हो,हिन्दी,अवधी,भोजपुरी,पंजाबी,इत्यदि,का सम्मान करना चाहिये, शर्म नही।।

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